Friday, July 22, 2022

भगवान की मजदूरी - Gaurishankar Chaubey

भगवान की मजदूरी

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा । 
राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा ?
माँ हंसी और चुप रह गई ।
पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था । उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे। तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी ।

संत ने कहा- अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो । पर ध्यान रखना, वेतन न लेना । अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत निष्काम रहना ।

वह लड़का गया । वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता ।

एक दिन राजा निरीक्षण करने आया । उसने लड़के की लगन देखी । प्रबंधक से पूछा- यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है ? इसे आज अधिक मजदूरी देना ।

प्रबंधक ने विनय की- महाराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है । पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता । कहता है मेरे घर का काम है । घर के काम की क्या मजदूरी लेनी ?

राजा ने उसे बुला कर कहा- बेटा ! तू मजदूरी क्यों नहीं लेता ? बता तू क्या चाहता है ?

लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- महाराज ! आपके दर्शन हो गए, आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई । अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए ।

राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया । और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया । राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया ।
बिल्कुल इसी प्रकार से भगवान ही हम सभी के राजा हैं । और हम सभी भगवान के मजदूर हैं । भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है । संत ही मंत्री है । भक्ति ही राजपुत्री है । मोक्ष ही वह राज्य है ।

हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत से मिलवा देते हैं और फिर अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं ।

वह लड़का सकाम कर्म करता, तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा । यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।
"तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम।
जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥"

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

Sunday, July 10, 2022

हकीकत

#हक़ीक़त

क्या आप जानते हैं कि आपके अंतिम संस्कार के बाद आम तौर पर क्या होगा??

कुछ ही घंटों में रोने की आवाज पूरी तरह से बंद हो जाएगी।

रिश्तेदारों के लिए खाना बनवाने या मंगवाने में जुटे जायेगा परिवार..

कुछ पुरुष सोने से पहले चाय की दुकान पर टहलने निकल जाएंगे।

कोई रिश्तेदार आपके बेटे या बेटी से फोन पर बात करेगा कि आपात स्थिति के कारण वह व्यक्तिगत रूप से नहीं आ पा रहा है।

और तो और इधर आपका मृत शरीर चिता पर जल रहा होगा, उधर आपको अंतिम विदाई देने आए लोगों में से कोई फोन पर किसी से बतिया रहा होगा, कोई वाट्स एप, फेसबुक पर व्यस्त होगा तो दूर झुंड बनाकर बैठे कुछ लोग घर परिवार, व्यवसाय, खेल आदि अन्य विषयों पर चर्चा कर रहे होंगे।
अगले दिन रात के खाने के बाद, कुछ रिश्तेदार कम हो जाएंगे, और कुछ लोग सब्जी में पर्याप्त नमक नहीं होने की शिकायत करते होंगे

भीड़ धीरे धीरे छंटने लगेगी..

आने वाले दिनों में
कुछ कॉल आपके फोन पर बिना यह जाने आ सकती हैं कि आप मर चुके हैं।

आपका कार्यालय या आपकी दुकान आपकी जगह लेने के लिए किसी ओर को ढूंढने में जल्दबाजी करेगा।

एक हफ्ते बाद आपकी मौत की खबर सुनकर,
आपकी पिछली पोस्ट क्या थी, यह जानने के लिए कुछ फेसबुक मित्र उत्सुकता से खोज कर सकते हैं।

 10 दिन बाद आपका बेटा और बेटी अपने अपने काम पर लौट आएंगे।

महीने के अंत तक आपका जीवनसाथी कोई कॉमेडी शो देख कर हंसने लगेगा।

सबका जीवन सामान्य हो जाएगा
आपको इस दुनिया में आश्चर्यजनक गति से भुला दिया जाएगा।

इस बीच आपकी प्रथम वर्ष पुण्यतिथि भव्य तरीके से मनाई जाएगी।पलक झपकते ही
साल बीत गए और आपके बारे में बात करने वाला कोई नहीं है।

एक दिन बस पुरानी तस्वीरों को देखकर आपका कोई बेहद करीबी आपको याद कर सकता है

लोग आपको आसानी से भूलने का इंतजार कर रहे हैं
फिर आप किसके लिए दौड़ रहे हो?
और आप किसके लिए चिंतित हैं?

क्या आप अपने घर,परिवार, रिश्तेदार को संतुष्ट करने के लिए जीवन जी रहे हैं? 

जिंदगी एक बार ही होती है, बस इसे जी भर के जी लो….
और जितना हो सके इसके परम उद्देश्य के जितना निकट पहुंच सको, पहुंचने का यत्न करे, जितना हो सके परमार्थ  कमा लो❤️
#स्वामीस्वर्गानन्द

Thursday, January 6, 2022

" ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी "

     

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया। 

वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।  किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।

जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।  सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया...... अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।  

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया | 

ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि,






आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा. 

कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा.   

कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे... 

ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है। 






सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!

इस संसार में....

      सबसे बड़ी सम्पत्ति "बुद्धि "

      सबसे अच्छा हथियार "धैर्य"

      सबसे अच्छी सुरक्षा "विश्वास"

      सबसे बढ़िया दवा "हँसी" है

और आश्चर्य की बात कि "ये सब निशुल्क हैं "



"सोच बदलो जिंदगी बदल जायेगी"🙏

Friday, August 27, 2021

"आप कर्म करते रहिये, ज़िंदगी आपको खूबसूरत मौके प्रदान करती रहेगी I

 गरीब बच्चा


एक पांच छ साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोड़कर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था. कपड़े में मैल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओ से भीग चुके थे. बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था. जैसे ही  एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा: क्या मांगा भगवान से ??

उसने कहा: मेरे पापा मर गए हैं.. उनके लिए स्वर्ग, मेरी माँ रोती रहती है.. उनके लिए सब्र और मेरी बहन के लिए कपड़े के पैसे. तुम स्कूल जाते हो ?? अजनबी का सवाल.... स्वाभाविक सा सवाल था, हा जाता हू.. उसने कहा किस क्लास में पढ़ते हो ?.... अजनबी ने पूछा, नहीं अंकल में पढ़ने नहीं जाता, माँ चने बना देती है  वही स्कूल के बच्चों को बेचता हू बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है।


बच्चे का एक - एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था, तुम्हारा कोई रिश्तेदार ?  न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा, पता नहीं... माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता माँ झूठ नहीं बोलती.... पर अंकल, मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है.


जब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती है, जब कहता हुं माँ तुम भी खाओ, तो कहती हैं मैने खा लिया था  उस समय लगता है झूठ बोलती है.

बेटा, अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढ़ाई करोगे ? बिल्कुल नहीं!! क्यों ? पढ़ाई करने वाले... गरीबों से नफरत करते हैं अंकल, हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा पास से गुजर जाते हैं.







अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी, फिर उसने कहा हर दिन इस मंदिर में आता हू, कभी किसी ने नहीं पूछा यहाँ सब आने वाले मेरे पिताजी को जानते थे, मगर हमें कोई नहीं जानता.

बच्चे ने मायूसी से पूछा अंकल, जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं?

"अजनबी के पास इसका कोई जवाब नही था".



*ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं बस एक कोशिश कीजिये और अपने असपास ऐसे जरूरतमंद यतीमों, बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद कीजिए*




मंदिर में सीमेंट या अन्न की बोरी देने से पहले अपने आस-पास किसी गरीब को देख लेना, शायद उसको आटे की बोरी की ज्यादा जरूरत हो।🙏🙏






स्वस्थ रहे ।। मस्त रहे ।। व्यस्थ रहे

गौरीशंकर चौबे 

Monday, July 19, 2021

नेक कर्म

 टूटी चप्पल


"पता नहीं ये सामने वाला सेठ हफ्ते में 3-4 बार अपनी चप्पल कैसे तोड़ लाता है?"


मोची बुदबुदाया, नजर सामने की बड़ी किराना दूकान पर बैठे सेठ पर थी। हर बार जब उस मोची के पास कोई काम ना होता तो उस सेठ का नौकर सेठ की टूटी चप्पल बनाने को दे जाता। 


मोची अपनी पूरी लगन से वो चप्पल सी देता की अब तो 2-3 महीने नहीं टूटने वाली। सेठ का नौकर आता और बिना मोलभाव किये पैसे देकर उस मोची से चप्पल ले जाता। पर 2-3 दिन बाद फिर वही चप्पल टूटी हुई उस मोची के पास पहुंच जाती। 


आज फिर सुबह हुई, फिर सूरज निकला। सेठ का नौकर दूकान की झाड़ू लगा रहा था। और सेठ,  अपनी चप्पल तोड़ने में लगा था , पूरी मश्शकत के बाद जब चप्पल न टूटी तो उसने नौकर को आवाज लगाई। "अरे रामधन इसका कुछ कर, ये मंगू भी पता नहीं कौनसे धागे से चप्पल सिलता है, टूटती ही नहीं।






"रामधन आज सारी गांठे खोल लेना चाहता था "सेठ जी मुझे तो आपका ये हर बार का नाटक समझ में नहीं आता। खुद ही चप्पल तोड़ते हो फिर खुद ही जुडवाने के लिए उस मंगू के पास भेज देते हो।"





सेठ को चप्पल तोड़ने में सफलता मिल चुकी थी। उसने टूटी चप्पल रामधन को थमाई और रहस्य की परते खोली "देख रामधन जिस दिन मंगू के पास कोई ग्राहक नहीं आता उसदिन ही मैं अपनी चप्पल तोड़ता हूं, क्योंकी मुझे पता है, मंगू गरीब है, पर स्वाभिमानी है, मेरे इस नाटक से अगर उसका स्वाभिमान और मेरी मदद दोनों शर्मिंदा होने से बच जाते है तो क्या बुरा है। 


आसमान साफ था पर रामधन की आँखों के बादल बरसने को बेक़रार थे।  


 लाकडाउन के कारण हमारे आसपास आज ऐसे अनेकों परिवार होंगे जिनके रोजगार छूट गये होंगे।अपने आसपास के किसी एक की चिंता यदि हम कर सकें तो बहुत बड़ी समस्या के समाधान में हम सहायक हो सकते हैं।                                                

                                                                  

       







🌳पर हित सरस धर्म नहीं भाई ।

पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।🌳


सभी को कुछ न कुछ जो बन पड़े दूसरों के दुख दर्द को बांटने का प्रयास करते रहना चाहिए, इससे जो आत्म सन्तुष्टि मिलेगी यकीन मानिए कई लाख और करोड़ खर्च कर देने पर भी दुनिया मे कही नही मिलेगी।




स्वस्थ रहे ।। मस्त रहे ।। व्यस्थ रहे

गौरीशंकर चौबे 





Saturday, July 3, 2021

भक्ति में ही शक्ति है

 ~ प्रभु का पत्र ~


मेरे प्रिय....

सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे में तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा की तुम मुझसे कुछ बात करोगे।  तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं।


फिर मैंने  सोचा की तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उलझन में लग गये की तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने हैं!!  फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज  इकठे करने के लिये घर में इधर से  उधर दौड़ रहे थे.... तो भी मुझे लगा की शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

फिर जब तुमने ओफिस जाने के  लिए ट्रेन पकड़ी तो में समझा की इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे। पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और में खड़ा का खड़ा ही रह गया। 


में तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो, तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं की। एक मौका ऐसा भी आया जब तुम बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यू ही बैठे रहे, लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया। 


दिन का अब भी काफी समय बचा था। मुझे लगा की शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जाएगी.... लेकिन घर पँहुचने के बाद, तुम रोज के कामों में व्यस्त हो गये। जब वे काम निपट गये तुमने टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे। और देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे।

तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्री कहा और चुपचाप चादर ओढकर सो गये। 


मेरा बड़ा मन था कि में भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनू.. 

तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ ..

तुम्हारी कुछ सुनु... तुम्हे कुछ सुनाऊँ। कुछ मार्गदर्शन करुँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किस लिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो... लेकिन, तुम्हें समय ही नहीं मिला और में मन मार कर ही रह गया। 



 में तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।

हर रोज़ में इस बात का इन्तज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे। 



पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगे मेरे आगे रख के चले जाते हो। और मजे की बात तो यह है कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते भी नहीं। 


खैर कोई बात नहीं....

हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये। 

ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुम में आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम... " आस्था और विश्वास ही तो है"।

     



 तुम्हारा ईश्वर....





                                                                      ~ संदेश ~


"अच्छे समय में अगर हम भगवान को शुक्रिया अदा नहीं करते, तो खराब समय के लिए भगवान को जिम्मेदार ठहराने का हमें कोई हक नहीं".


स्वस्थ रहे ।। मस्त रहे।। व्यस्थ रहे

सदैव मुस्कुराते रहे 


गौरीशंकर चौबे

Thursday, July 1, 2021

क्या हम सामाजिक नहीं रहे ? - Gaurishankar Chaubey


हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, यह आम चलन था!

 हमने (ईश्वर वैदिक) यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देख हुई हैं!

जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं!

यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा!

उस जमाने का देसीघी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि  2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है ! उस देसी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिलाता था!

टिटहरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको सेती है...हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टिटहरी चिल्लाती मिलती थी तो किसान इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था! उस जमाने में आधुनिकशिक्षा नहीं थी!

सब आस्तिक थे!
 
दोपहर को किसान जब आराम करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता और फिर खुद भोजन करता था...यह एक सामान्य नियम था !

बैल जब बूढ़ा हो जाता था तो उसे कसाइयों को बेचना शर्मनाक सामाजिकअपराध की श्रेणी में आता था!
बूढाबैल कई सालों तक खाली बैठा चारा खाता रहता था...मरने तक उसकी सेवा होती थी!

उस जमाने के तथाकथित अशिक्षित किसान का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक इसकी माँ का दूध पिया और इसकी कमाई खाई है...अब बुढापे में इसे कैसे छोड़ दें? कैसे कसाइयों को दे दें काट खाने के लिए?

जब बैल मर जाता तो किसान फफक-फफक कर रोता था और उन भरी दुपहरियों को याद करता था जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था! माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बुड्ढे बैल की मौत पर रोने लगते थे!
लगता..... घर का कोई बड़ा सदस्य ही चला गया है।

पूरा जीवन काल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है?

वह पुराना भारत इतना शिक्षित और धनाढ्य था कि अपने जीवनव्यवहार में ही जीवनरस खोज लेता था । वह करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला वैभवशाली भारत था ! 

वह अतुल्य भारत था!

 सोने की चिड़िया !
सोने जैसे दिलों वाले लोगों का भारत !

 जहां से ,जिससे, जैसे भी सहयोग मिला हो , सबके प्रति कृतज्ञता और प्रेम । पेड़ पौधों में देवता , नदियों में देवी , वायु देवता , अग्नि देवता, वरुण देवता सूर्य देवता । सबको सम्मान, सबका संरक्षण।विशेष दिन, त्योहारों, अवसरों पर अलग अलग तरीकों से कृतज्ञता ज्ञापन । 

चाहे विवाह के अवसर पर कुम्हार के लिए अनाज कपड़ों का उपहार के जाना और चाक पूजना, नदी कुओं की पूजा कर पानी लाना , बच्चों के जन्म के बाद कुआं पूजने की रस्म आदि बहुत सी रस्में। दैनिक जीवन में सुबह ही तुलसी मैया तथा पीपल देवता की पूजा से होती है।

पर अब
ये सब छूट गया । क्या हम सामाजिक नहीं रहे ? 

अहसान फरामोश हो गए ? 

नहीं ! 
बस हम प्रेक्टिकल हो गए हैं।प्रकृति से साधन तो सब लेने हैं पर कृतज्ञ हम किसी के नहीं हैं। 
सबके लिए पैसा चुका रहे है ना ? 
माता पिता तक के कृतज्ञ नहीं  
हमारे जीवन का केंद्र बन गया है  पैसा।

सभी गतिविधियां , रिश्ते पैसे पर निर्भर करते है ।इसीलिए जीवन से मिठास गायब है।

आइए इस पर विचार करें, 

चिंतन मनन करें। चलिए कुछ रिश्ते निस्वार्थ भाव से , बिना किसी अपेक्षा के निर्वहन करने का प्रयास करें, चाहे वो इंसान इंसान के बीच का रिश्ता हो , या फिर इंसान और प्रकृति ( पेड़ , पशु, पक्षी , नदी , तालाब ) के बीच का।