Monday, May 8, 2023

जीवन का कठोर सत्य

भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए।

द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर चले गए।

तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी।

चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे।

उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की द्रष्टि से देखा।

गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।

गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद बापिस कैलाश पर आ गया।


आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था।

यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी।

मैं सोच रहा था कि वो इतनी जलदी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।"

गरुड़ समझ गये "मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।"

इस लिए कृष्ण कहते है :-

करता तू वह है, जो तू चाहता है

परन्तु होता वह है, जो में चाहता हूँ

कर तू वह , जो में चाहता हूँ

फिर होगा वो, जो तू चाहेगा ।

                            🙏जय श्री कृष्णा🙏

Saturday, March 4, 2023

~ नेक कर्म ~

अचानक कह दिया गया कि आपके पास जो नोट हैं, वो नहीं चलेंगे... बदलने के लिए 50 दिन है. आप घबरा गए और कोशिश करने लगे कि किसी भी तरह जल्द से जल्द आपके नोट बदल जाए.


जरा सोचिए एक दिन वो आनेवाला है, जब आपसे कह दिया जाएगा कि आपके पास जो कुछ है.... कुछ नहीं चलेगा, सिर्फ आपके कर्म ही चलेंगे. जिसे बदलने के लिए 1सेकंड भी नहीं मिलेगा, तो सोचिये क्या होगा उस दिन आपका. उस दिन के लिए वो इकठ्ठा करें.... जो वहाँ चलेगा.


"कुँवे का पानी सब फसलों को एक समान मिलता है, लेकिन फिर भी करेला कड़वा, बेर मीठा और इमली खट्टी होती है".यह दोष पानी का नहीं है, बीज का है, वैसे ही भगवान सब के लिए एक समान है, लेकिन दोष कर्मो का है.

तेरा मेरा करते एक दिन चले जाना है, जो भी कमाया यही रह जाना है. कर ले कुछ अच्छे कर्म, साथ यही तेरे जाना है.


"किस धन का मैं अहंकार करुँ जो अंत में, मेरे प्राणों को बचा ही नहीं पाएगा", "किस तन पे मैं अहंकार करूँ जो अंत में, मेरी आत्मा का बोझ भी नहीं उठा पाएगा", किन साँसों का मैं एतबार करूँ जो अंत में, मेरा साथ छोड़ जाएगी. किन रिश्तों का मैं यहाँ आज अभिमान करुँ, जो रिश्ते शमशान में पहुँचकर सारे टूट जाएगे.



क्यों न यहाँ मैं, अपने नेक कर्मो की पूंजी इकट्ठी कर लूँ, यह यहाँ भी और वहाँ भी साथ देते हैं.



                            

                           ~ संदेश ~

इंसानियत दिल में होती है.... हैसियत में नहीं, उपरवाला कर्म देखता है... वसीयत नहीं.










Wednesday, February 1, 2023

जीवन में एक-दूसरे को समझने की कोशिश करे

 "ये एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ"।


                                  


आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है।

महिला सोचती है: - ‘मैं गिरने वाली हूं और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि साँप मुझे काट रहा है।" आदमी अधिक 

ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींचता!

आदमी सोचता है:- "मैं बहुत दर्द में हूं फिर भी मैं आपको उतना ही खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकता हूँ!

आप खुद कोशिश क्यों नहीं करती और कठिन चढ़ाई को पार कर लेती. आदमी को ये नहीं पता है कि औरत को 

सांप काट रहा है.


नैतिकताः- आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने 

वाला भी  उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं।




यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश 

करनी चाहिए, अलग अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना चाहिए।




हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम जब हम 

अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक दूसरे को प्यार, स्नेह और साथ

रहने की खुशी का एहसास दें, जीवन की इस यात्रा को लड़ने की बजाय प्यार और भरोसे पर आसानी से पार किया 

जा सकता है।




|| स्वस्थ रहे || मस्त रहे || व्यस्त रहे ||























Wednesday, January 18, 2023

"सुख - दुःख नज़रियों का खेल"

 

प्रोफेसर संजय हमेशा अपनी क्लास में बच्चों को कुछ नयी सीख दिया करते थे. एक दिन उन्होंने क्लास में घुसते ही बोला- आज मैं आप सबकी परीक्षा लूँगा. सारे छात्र डर गए , प्रोफेसर ने एक सफ़ेद लिफाफा निकाला और उसमें से सभी छात्रों को एक-एक प्रश्न पत्र देना शुरू कर दिया. वह प्रश्न पत्र को पलट कर सबकी मेज़ पर रखते जा रहे थे, जिससे कोई प्रश्न न पढ़ सके जब सभी छात्रों को प्रश्न पत्र मिल गया, तो प्रोफेसर बोले, अब आप सब शुरू कर सकते हो।



black-dotकिसी ने भी एक दूसरे की कॉपी मे झाँका या पूछने की कोशिश की, तो उसके नंबर काट लिए जाएंगे. सभी छात्रों ने प्रश्न पत्र पलटकर देखा और हैरानी से एक दूसरे की तरफ देखने लगे, प्रोफेसर बोले क्या हुआ- आप लोग इतने हैरान क्यू हो ? एक छात्र बोला, सर इसमें कोई प्रश्न तो है ही नहीं बस एक सादा कागज़ है और बीचों बीच एक काला बिंदु, हमें जवाब क्या देना है ?


प्रोफेसर बोले, इसे देख कर आपके मन में जो भी आए वह पीछे लिख दीजिये. आपके पास सिर्फ 10 मिनट का वक़्त है, सभी छात्रों ने लिखना शुरू कर दिया। 10 मिनट बाद प्रोफेसर ने सभी के उत्तर इकट्ठा किए और पूरे क्लास के सामने एक-एक कर के पढ़ने लगे. हर छात्र ने उस काले बिन्दु की व्याख्या लिखी थी।



किसी ने लिखा था – वह दो बिन्दुयों को मिलाकर बनाया गया है, किसी ने लिखा था – वह पहले चकोर था बाद में गोल बनाया गया है. प्रोफेसर बोले चिंता मत कीजिये, इस परीक्षा का अंको से कोई वास्ता नहीं है. लेकिन ज़रा सोचिए आप सब अपना जवाब सिर्फ एक काले बिन्दु के ऊपर दिया है. किसी ने उस खाली सफ़ेद हिस्से के बारे मे कुछ नहीं लिखा. सभी ने सोचते हुये हाँ मे सर हिलाया।


प्रोफेसर बोले- कुछ ऐसा ही हम अपनी ज़िंदगी के साथ भी करते हैं। काले दागों में इतना खो जाते हैं कि ज़िंदगी के सफ़ेद पन्नों पर नज़र ही नहीं जाती. यहाँ काले दाग से मेरा आशय है, हमारी ज़िंदगी कि तकलीफ़े, बीमारियाँ या कोई दुख, पर हमारी ज़िंदगी में कितना कुछ अच्छा है, जिसकी तरफ हमारी नज़र ही नहीं जाती है, जैसे कि हमारा परिवार, दोस्त, छोटी-छोटी खुशियाँ।



कभी सोचा है, हमारे पास परेशान और दुखी होने के लिए कितने कारण हैं, और खुश रहने के लिए कितने ? शायद अगर हम गिने तो, तो खुशी के कारण दुख के कारण से कई गुना ज्यादा मिलेंगे. मतलब खुश रहने के लिए हमारे पास बहुत सी वजहें हैं. सभी छात्र चुपचाप प्रोफेसर के बात सुन रहे थे।


प्रोफेसर ने छात्रों को जीवन को देखने का नया नज़रिया दिया था ।


"हम चाहे तो खुश रह सकते हैं या दुखी

यह सिर्फ नज़रियों का खेल है"



दोस्तों कहानी छोटी बेशक है लेकिन, अपने अंदर गंभीर सार छिपाये हुए है. सभी बच्चों को उस कोरे कागज पे एक काला बिंदु ही दिखाई दिया लेकिन इतना बड़ा कोरा कागज था उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।



सच कहा गया है कहानी में कि छोटे से दुःख को लेकर हम अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं, लेकिन बड़ी बड़ी खुशियों पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. दोस्तों काले धब्बे से नजर हटाइये फिर देखिये खुश रहने की हजार वजहें आपको मिल जायेंगी।  






 







































Wednesday, December 21, 2022

जिंदगी बदलने के लिए दर्द सहो

 दोस्तों जिंदगी में बहुत बार हम कठिनाईयों को देखकर डर जाते हैं और जो कुछ तकलीफें आती हैं उनका बहाना देकर हम अपना लक्ष्य छोड़ देते हैं।

जिसका परिणाम बहुत ही बुरा होता हैं। हम अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं। ऐसी ही एक कहानी लेकर आया हूँ।



एक बार एक मूर्तिकार एक पत्थर को छेनी और हथौड़ी से काट कर मूर्ति का रूप दे रहा था। जब पत्थर काटा जा रहा था, तो उसको बहुत दर्द हो रहा था।

और वो पत्थर मूर्तिकार के सामने रोने लगा। मूर्तिकार ने पूछा क्यों रो रहे हो भाई, मैं तो तुम्हे भागवान का रूप दे रहा हु, आज तुम ये दर्द बर्दास्त कर लोगे तो लोग कल तुम्हे पूजेंगे।


पत्थर बोला नहीं मुझे दर्द हो रहा है। प्लीज मुझे छोड़ दो।


मूर्तिकार ने उस पत्थर को वही रास्ते में छोड़ दिया और बगल में पड़ा दूसरा पत्थर उठाया और उसकी मूर्ति बना डाली। दूसरे पत्थर ने दर्द बर्दास्त कर किया, और वो भागवान की मूर्ति बन गया।




लोग रोज उसे माला फूल चढाने लगे।


और लोगो ने रास्ते में पड़े उस पत्थर को (जिसने दर्द बर्दास्त नहीं किया था) लाकर उसी मंदिर में रख दिया, ताकी ये नारियल फोड़ने के काम आएगा।


जिस पत्थर ने एक बार दर्द बर्दास्त नहीं किया, आज वो जिंदगीभर दर्द बर्दास्त कर रहा है। और जिसने सही वक़्त पर एक बार दर्द बर्दास्त करना सही समझा वो तो भगवान् बन गया। आज उसके ऊपर माला फूल चढ़ाया जाता हैं।


दोस्तों हमारे लिए ये सही समय है, हमें निर्णय लेने के लिए। की, हमें आज दर्द बर्दास्त करना है, या जिंदगी भर दर्द बर्दास्त करना है। जो लोग खुद का लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते हैं, वो हमेशा पश्चाताप करते हैं।

क्यों की उन्हें जिंदगी भर दुसरो के हिसाब से जीना पड़ता हैं ।




इसलिए अपना कोई न कोई लक्ष्य जरूर बनायें। फैसला आपका होगा तो मंजिल भी आपकी ही होगी। और हमें तब तक ये दर्द बर्दास्त करना है जबतक की हम अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लें ।


|| स्वस्थ रहे || मस्त रहे || व्यस्त रहे ||















Wednesday, November 16, 2022

पिता का समाज व पुत्रों के नाम पत्र

 लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली। 

चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है।



पिता सेना में कर्नल के पद से रिटार्यड हुए. वे लखनऊ के एक पॉश कॉलोनी में अपनी पत्नी के साथ रहते थे उनके दो बेटे थे जो सुदूर अमेरिका में रहते थे.  यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि माता-पिता ने अपने लाड़लों को पालने में कोई कोर कसर नहीं रखी.  बच्चे सफलता की सीढ़िंया चढते गए पढ़-लिखकर इतने योग्य हो गए कि दुनिया की सबसे नामी-गिरामी कार्पोरेट कंपनी में उनको नौकरी मिल गई. संयोग से दोनों भाई एक ही देश में,लेकिन अलग-अलग अपने परिवार के साथ रहते थे.




एक दिन अचानक पिता ने रूंआसे गले से बेटों को खबर दी। बेटे! तुम्हारी मां अब इस दुनिया में नहीं रही । पिता अपनी पत्नी की मिट्टी के साथ बेटों के आने का इंतजार करते रहे। एक दिन बाद छोटा बेटा आया, जिसका घर का नाम चिंटू था। 


पिता ने पूछा चिंटू! मुन्ना क्यों नहीं आया। मुन्ना यानी बड़ा बेटा।पिता ने कहा कि उसे फोन मिला, पहली उडान से आये। धर्मानुसार बडे बेटे का आना सोच वृद्व फौजी ने जिद सी पकड़ ली। 


छोटे बेटे के मुंह से एक सच निकल पड़ा। उसने पिता से कहा कि मुन्ना भईया ने कहा कि, "मां की मौत में तुम चले जाओ। पिता जी मरेंगे, तो मैं चला जाऊंगा।"




कर्नल साहब (पिता) कमरे के अंदर गए। खुद को कई बार संभाला फिर उन्होंने  चंद पंक्तियो का एक पत्र लिखा।जो इस प्रकार था- 


प्रिय बेटो

मैंने और तुम्हारी मां ने बहुत सारे अरमानों के साथ तुम लोगों को पाला-पोसा। दुनिया के सारे सुख दिए। देश-दुनिया के बेहतरीन जगहों पर शिक्षा दी। जब तुम्हारी मां अंतिम सांस ले रही थी, तो मैं उसके पास था।वह मरते समय तुम दोनों का चेहरा एक बार देखना चाहती थी और तुम दोनों को बाहों में भर कर चूमना चाहती थी। तुम लोग उसके लिए वही मासूम मुन्ना और चिंटू थे। उसकी मौत के बात उसकी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने लिए मैं था। मेरा मन कर रहा था कि काश तुम लोग मुझे ढांढस बधाने के लिए मेरे पास होते। मेरी मौत के बाद मेरी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने के लिए कोई नहीं होगा। सबसे बड़ी बात यह कि मैं नहीं चाहता कि मेरी लाश निपटाने के लिए तुम्हारे बड़े भाई को आना पड़े। इसलिए सबसे अच्छा यह है कि अपनी मां के साथ मुझे भी निपटाकर ही जाओ। मुझे जीने का कोई हक नहीं क्योंकि जिस समाज ने मुझे जीवन भर धन के साथ सम्मान भी दिया, मैंने समाज को असभ्य नागरिक दिये। हाँ अच्छा रहा कि हम अमरीका जाकर नहीं बसे, सच्चाई दब जाती। 


मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे मैडल तथा फोटो बटालियन को लौटाए जाए तथा घर का पैसा नौकरों में बाटा जाऐ। जमापूँजी आधी वृद्ध सेवा केन्द्र में तथा आधी सैनिक कल्याण में दी जाऐ।

                                                                    

तुम्हारा पिता  


कमरे से ठांय की आवाज आई। कर्नल साहब ने खुद को गोली मार ली।


यह क्यों हुआ, किस कारण हुआ? कोई दोषी है या नहीं। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना। 





                                       हाँ यह काल्पनिक कहानी नहीं। पूरी तरह सत्य घटना है। 


माँ और पिता ऐसे होते है, जिनके होने का एहसास कभी नहीं होता, लेकिन ना होने का एहसास बहुत होता है। 

















Thursday, October 27, 2022

अच्छी सोच

 

एक महान विद्वान से मिलने के लिये एक दिन रोशनपुर के राजा आये। राजा ने विद्वान से पुछा, ‘क्या इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति है जो बहुत महान हो लेकिन उसे दुनिया वाले नहीं जानते हो?’


विद्वान ने राजा से विनम्र भाव से मुस्कुराते हुये कहा, ‘हम दुनिया के ज्यादातर महान लोगों को नहीं जानते हैं।’ दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो महान लोगों से भी कई गुना महान हैं।




राजा ने विद्वान से कहा, ‘ऐसे कैसे संभव है’। विद्वान ने कहा, मैं आपको ऐसे कई व्यक्तियों से मिलवाऊंगा। इतना कहकर विद्वान, राजा को लेकर एक गांव की ओर चल पड़े। रास्ते में कुछ दुर पश्चात् पेड़ के नीचे एक बुढ़ा आदमी वहाँ उनको मिल गया। बुढ़े आदमी के पास एक पानी का घड़ा और कुछ डबल रोटी थी। विद्वान और राजा ने उससे मांगकर डबल रोटी खाई और पानी पिया।


जब राजा उस बूढ़े आदमी को डबल रोटी के दाम देने लगा तो वह आदमी बोला, ‘महोदय, मैं कोई दुकानदार नहीं हूँ। मेरे बेटे का डबल रोटी का व्यापार है, मेरा घर में मन नहीं लगता इसलिये राहगिरों को ठंडा पानी पिलाने और डबल रोटी खिलाने आ जाया करता हूँ। इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है।                                           



     "मैं बस वही कर रहा हूँ जो मैं इस उम्र में करने योग्य हूँ "  



विद्वान ने राजा को इशारा देते हुए कहा कि देखो राजन् इस बुढ़े आदमी की इतनी अच्छी सोच ही इसे महान बनाती है।


फिर इतना कहकर दोनों ने गाँव में प्रवेश किया तब उन्हें एक स्कूल नजर आया। स्कूल में उन्होंने एक शिक्षक से मुलाकात की और राजा ने उससे पूछा कि आप इतने विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं तो आपको कितनी तनख्वाह मिलती है। उस शिक्षक ने राजा से कहा कि महाराज मैं तनख्वाह के लिये नहीं पढ़ा रहा हूँ, यहाँ कोई शिक्षक नहीं थे और विद्यार्थियों का भविष्य दाव पर था इस कारण मैं उन्हें मुफ्त में शिक्षा देने आ रहा हूँ।



विद्वान ने राजा से कहा कि महाराज दूसरों के लिये जीने वाला भी बहुत ही महान होता है। और ऐसे कई लोग हैं जिनकी ऐसी महान सोच ही उन्हें महान से भी बड़ा महान बनाती हैं।


इसलिए राजन् अच्छी सोच आदमी का किस्मत निर्धारित करती है।


इसलिए  हमेशा अच्छी बातें ही सोचकर कार्य करें और महान बनें। आदमी बड़ी बातों से नहीं बल्कि अच्छी सोच व अच्छे कामों से महान माना जाता है।




शिक्षा:-    Life में कुछ Achieve करने के लिये और सफलता हासिल करने के लिये बड़ी बातों को ज्यादा Importance देने के बजाय अच्छी सोच को ज्यादा महत्व देना चाहिये क्योंकि आपकी अच्छी सोच ही आपके कार्य को निर्धारित करती है.



मनन अवश्य करें         

                                

    ।। स्वस्थ रहे, मस्त रहे, व्यस्थ रहे ।।